Couplets [ अशार ]

here are the Words I like from poems.

तेरा ख़याल है, तेरा जमाल है, तू है, मुझे ये ताबिश-ओ-दानिश कहाँ कि मैं क्या हूँ!

— unknown

भूक के एहसास को शेर-ओ-सुख़न तक ले चलो या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो

जो ग़ज़ल माशूक़ के जल्वों से वाक़िफ़ हो गई उस को अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो

— अदम गोंडवी

किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मिरी ज़िंदगी की आदत हो

दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मिरी आख़री मोहब्बत हो

— जौन एलिया

तुम्हारी यादो के जब ज़ख्म भरने लगते हैं किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

— फैज अहमद फैज

तमाम रात वो आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए 'इज़्ज़त और वक़ार दिखे

मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बे-शुमार दिखे

— Tehzeeb Hafi

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत

— बशीर बद्र

इस ख़्वाब के माहौल में बे-ख़्वाब हैं आँखें जब नींद बहुत आएगी बिस्तर न मिलेगा

ये सोच लो अब आख़िरी साया है मोहब्बत इस दर से उठोगे तो कोई दर न मिलेगा

— Bashir Badr

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा

— बशीर बद्र

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

— निदा फ़ाज़ली

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

दूसरी कोई लड़की ज़िंदगी में आएगी कितनी देर लगती है उस को भूल जाने में

— बशीर बद्र

गुज़िश्ता (बीता हुआ) साल तुम्हे मैं ने गिन के रक्खा था किसी ग़रीब की जोड़ी हुई रक़म की तरह

— जौन एलिया

हमें ख़बर है कि हम हैं चराग़-ए-आख़िर-ए-शब हमारे बाद अंधेरा नहीं उजाला है

— ज़हीर काश्मीरी